
तमिलनाडु सरकार ने आखिरकार अभिभावकों की जूझती जेबों को राहत देने का बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने “तमिलनाडु स्कूल (शुल्क संग्रह विनियमन) संशोधन अधिनियम 2026” पास किया, जिसका मकसद प्राइवेट स्कूलों की लगातार बढ़ती फीस पर कड़ा नियंत्रण लगाना है। अब फीस बढ़ोतरी का बोझ सीधे माता-पिता की जेब पर नहीं आएगा।
संशोधन के तहत 7 सदस्यीय सुपर कमिटी का गठन किया गया है, जिसकी अध्यक्षता हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज करेंगे। इस कमिटी का काम होगा प्राइवेट स्कूलों के लिए नया फीस स्ट्रक्चर तय करना और इसे लागू करना सभी स्कूलों के लिए अनिवार्य बनाना। नया स्ट्रक्चर 3 साल तक वैध रहेगा, ताकि अभिभावकों और स्कूल दोनों को निश्चितता और स्थिरता मिले।
समिति में शामिल होंगे:
- राज्य अभिभावक शिक्षक संघ का प्रतिनिधि,
- विद्यालय शिक्षा निदेशक,
- निजी स्कूल और प्राथमिक शिक्षा प्रतिनिधि,
- लोक निर्माण विभाग के संयुक्त मुख्य अभियंता, और
- विद्यालय शिक्षा विभाग के अधिकारी।
मकसद साफ है, अब फीस निर्धारण में अभिभावकों की आवाज़ सीधे शामिल होगी। पहले स्कूल फीस तय करने का पूरा अधिकार केवल स्कूल अधिकारियों के पास था, लेकिन इस संशोधन के साथ पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित होगी।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कदम शिक्षा और वित्तीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने में मदद करेगा। सरकार जैसे कह रही हो: “अब फीस सिर्फ पढ़ाई तक रहे, जेब पर थप्पड़ नहीं पड़ेगा!”।

इस अधिनियम से न केवल अभिभावकों की आर्थिक राहत मिलेगी, बल्कि प्राइवेट स्कूलों की मनमानी पर भी लगाम लगेगा। स्कूलों को अब तय सीमा के भीतर ही फीस बढ़ानी होगी और किसी भी तरह की छुपी हुई चार्जिंग का खेल खत्म होगा।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि कमिटी फीस स्ट्रक्चर के नियम और शर्तें तय करेगी, जिससे आने वाले तीन साल तक कोई भी स्कूल अचानक फीस बढ़ाने की हिम्मत नहीं करेगा। इस कदम से माता-पिता को संतुलित बजट और बचत का मौका मिलेगा।
तमिलनाडु का नया कानून शिक्षा के क्षेत्र में पारदर्शिता, वित्तीय सुरक्षा और अभिभावक अधिकारों को मजबूत करता है। यह कदम न केवल अभिभावकों के लिए राहत है, बल्कि प्राइवेट स्कूलों को जिम्मेदार और पारदर्शी बनाने की दिशा में भी एक बड़ा कदम है।
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